Words And Voices 14: “शौक या मजबूरी”

Words And Voices 14: “शौक या मजबूरी”

अपनी ज़िंदगी को बर्बाद करना किसी को अच्छा नहीं लगता,

दिल पे पत्थर रखके रोना किसी को अच्छा नहीं लगता,

होती है मज़बूरी जो मजबूर करवा देती है जनाब ,

वरना इतनी खूबसूरत सी दुनिया के होते हुवे भी,

कीचड़ में सोना, किसी को अच्छा नहीं लगता,

 

अपने नाम के बदले में, वैश्या सुनना किसी को अच्छा नहीं लगता,

लोगो के मुंह से अपने दाम सुनना किसी को अच्छा नहीं लगता,

ये तो पापी पेट ओर परिवार का सवाल है जनाब,

वरना अपने परिवार को अकेला छोड़ के ,

कहीं ओर जाना, किसी को अच्छा नहीं लगता,

 

ख़ुद की ही नज़ऱो में गिरना,किसी को अच्छा नहीं लगता,

हररोज़ ख़ुद के लिए वो गालियों का तोहफा किसी को अच्छा नहीं लगता,

ये तो छोटी सी ज़िन्दगी गुज़ारने की बात है जनाब,

वरना हररोज़ अपने चारित्र पे वो दाग लगना, किसी को अच्छा नहीं लगता,

अपने बचों पे संकट आये, ये किसी को अच्छा नहीं लगता,

अपने मन को मार के,आत्मसम्मान को मिटा के,पैसा कमाना किसी को अच्छा नहीं लगता,

ये तो अपने वजूद की बात है,इस दुनिया में बनाये रखने की जनाब ,

वरना मतलबी इस दुनिया में घुट घुट के जीना, किसी को अच्छा नहीं लगता,

कोई कुछ होता नहीं,कोई कुछ ऐसे ही बनता नहीं,

हररोज़ अपने जिस्म को कोई युही बेचता नहीं,

हालात होते है कुछ ऐसे जो कुछ बना देते है,

जनाब,वरना

वैश्या बनना किसी का शौक़ नहीं।

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