Words And Voices: सिलसिला तुम्हारे कल का

Words And Voices: सिलसिला तुम्हारे कल का

तुम कल क्या थे उसका गुमान क्यों करते हो,
तुम कल क्या बनोगे उसकी फिक्र क्यों करते हो,
एक तो वो वक़्त था जो तुमने खो दिया,
और एक वो वक़्त है जो अभी आया नही,

तो चलो अब जो थोड़ा वक़्त है उस्को बेहतर बनाते है,
आज फिर एक बार ज़िंदगी को पहचानते है।
सवाल तोह है बोहोत, पर जवाब देने वाला कोई नई,
प्यार करने वाले है बोहोत पर निभाने वाला कोई नही।
नाशिहत वर्तमान काल में जीने की बात तो हुम् बी दिया करते थे,
पर क्या वो नाशिहत पर कभी हुन ऐतबार करते है।

आने वाले कल के बारे में तोह शेखचिल्ली बी सोचता था,
क्या तुम कभी शेखचिल्ली से प्यार करते थे?

इसीलिए जीना है तो वर्तमान काल मे जी ले,
क्योंकि की कल की सोच तोह मृत्यु बी नही करती,
और जब वो आती है तब तुम्हारे आज का नही पूछती।

तभी तो किसीने कहा था ज़िन्दगी चार दिन की होती हौ जी लो उसको,
पर भैया जिसने बी ये कहा था उसने कभी मोहोब्बत नही की होगी,
अगर की होती तोह,
वो बी आज बोलते,
जिंदगी सौ दिन की बी कम पड़ती है उनकी तलाश में,
जीन की याद में रोज जाम है भरते का महखाने की चार दीवारों में।

पर मोहोब्बत तो बस एक पहलू है ज़िन्दगी का,
और आशयों के बोज का तो है सिलसिला सालो का,
औऱ उस आशयों के साथ तुम वर्तमान काल में जीने की बात करते हो,
आए कवि भूल गए क्या,
तुम्हारी कलम बी तो है सिलसिला तुम्हारे कल का।

 

Vyom Desai

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