Words And Voices: घर

Words And Voices: घर

माना कि हर चौखट हर किवाड़ कच्चा था

घर मेरा जब छोटा था तभी अच्छा था

 

रोटियाँ शायद कभी कभी कम पड़ती थीं

मगर खुशियों का कोई ठिकाना न था

 

आँगन भी खिलखिलाता सा एक बच्चा था

घर मेरा जब छोटा था तभी अच्छा था

 

माना कि सोना आँगन में पड़ता था हमें

लेकिन रिश्ते खानों में नहीं बटा करते थे

 

रिश्ता दूर का था फिर भी सच्चा था

घर मेरा जब छोटा था तभी अच्छा था