Words And Voices: कौन सुनता है मुझे, पता नहीं

Words And Voices: कौन सुनता है मुझे, पता नहीं

 

कौन सुनता है मुझे, पता नहीं
मैं कहाँ हूँ, पता नहीं
मेरी इस बदहाली की वजह भी पता नहीं
एक कपडे में लिपटा, या शायद चादर है
झाड़ियों के बीच उलझा हूँ
या ये बदन में पत्थर कंकर या गिट्टियां चुभ रही है
क्या मेरी माँ मेरी सिसकियाँ सुन रही है
सैंकड़ो चीटियां चल रही है बदन पर मेरे
कई सवाल भी तो उमड़ रहे होंगे जेहन में तेरे
मुझसे अक्सर जब रात में बात करती थी
माँ तू मुझे तब बहुत अच्छी लगती थी
देखो कोई मुझे नोच रहा है
कौन छोड़ गया नरम माँस शायद सोच रहा है
जुबां से चाटता है, कहीं कहीं से काटता है
खून भी अब रिस रहा है, माँ तेरा जेहन भी शायद पिस रहा है
जब मुझे पाना ही नहीं था तू बुलाया क्यों
इस दर्द भरी जगह पर लिटाया क्यों
कोई छाती भी नहीं मुझे अपने से लगाने को
गूंजा रहा मेरा रुदन बस इस वीराने को
भीड़ सी लग रही है अब चारों ओर,
एक बच्चा मिल गया खून में सना मच गया शोर
पता नहीं ये क्या बतिया रहे है, किसी अनजान जगह शायद ले जा रहे है
कोई बोल रहा है ज़मी से मिली है
नाम इसका सीता रख दो
या फिर प्रभु की कृपा है तो गीता रख दो
मैं बस सुन रही हूँ,
किसी ने कुछ नरम सा मुँह में लगा दिया है
लोग कह रहे है बच्ची को दूध पिला दिया है
पर इसमें तेरी छाती का स्वाद क्यों नहीं है
मेरी आस पास तेरी आगोश क्यों नहीं है
मेरी जात, धर्म या अस्तित्व पर सवाल क्यों है
एक बच्ची मिली झाड़ियों से, इस बात पर बवाल क्यूँ है,
मैं समझ नहीं पा रही, कुछ चुभा है जरूर,
जेहन में नहीं, शरीर में
एक बंद कमरे में कुछ लोग खड़े है आस पास
ऊपर रौशनी है बहुत तेज, कह रहे है बचने की कम है आस
मैं सिसक उठी हूँ एक बार फिर
कौन सुनता है मुझे, पता नहीं
मैं कहाँ हूँ, पता नहीं
मेरी इस बदहाली की वजह भी पता नहीं