गुजरात की वो कहानी, पंक्चर वाले की ज़ूबानी – १

गुजरात की वो कहानी, पंक्चर वाले की ज़ूबानी – १

गुजरात की वो कहानी, पंक्चर वाले की झुबानी- १  has been edited by Ishita Gupta


भैया एक मार्लबोरो का बॉक्स और एक चाय. और हाँ सुनो, इधर अभी कोई पेट्रोल पंप होगा क्या?’

“साहब पेट्रोल पंप का तो पता नई पर हाँ इधर से सीधा जाकर तीसरी गली में एक पंक्चर वाला मिल जाएगा।”

शुक्रिया भैया, ये लो आपके ३०० रुपया।”

चाय वाले के साथ सिलसिला ख़तम करके मैं बस आगे चला ही था कि मुझे महसूस हुआ की हाँ यह शहर भी रात को सोता है। वो सूनसान गलियों को देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो चाँद की  रौशनी एक माँ की तरह शहर को अपनी गोद सिमट के सुला रही हो। अपनी एक्टिवा को धक्का देते हुए मैं तीसरी गली तक पहुंचा; पूरी गली में अंधेरा था और उस अंधेरे में एक लाइट दिख रही थी टिमटिमाती हुई जैसे खुले आसमान में  ध्रुव का तारा।

आखिरकार जब मैं उस दुकान के द्वार पहुंचा तब पता चला की असल में वोह दुकान नहीं थी, वह किसी का घर था। उसके घर के एक कोने में एक अदभुत चित्र था और उसके बगल में खटिया पड़ी हुई थी। ऐसा लग रहा था मानो के वो चित्र किसी आदमी की पूरी ज़िंदगी बयां कर रही हो। उसके बिलकुल सामने उसने अपनी एक छोटी सी अलमारी जिसमे पंक्चर की किट और कुछ ज़रूरी साधन रखे हुए थे।

फिर जाकर मेरी नज़र उस इन्सान पर पड़ी, वो एक कोने में एक तस्वीर लेकर बैठा था तभी मैंने आवाज़ लगाई ,”भैया, एक्टिवा का आगे का टायर पंक्चर हो गया है, पंक्चर बना दोगे? “

उसने मेरी तरफ देखा और कहा, “साहब, १२ बजे के बाद डेढ़ गुना पैसे लगता है ।”

“ठीक है। “

उसको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने आप में ही एक अंत है। उसका चेहरे ही काफी था उसकी जंग की गाथा बताने के लिए | उसके दाई आँख से सिर तक एक उम्दा घाँव था। उसके बाए हाथ पर दो घाँव और उसके गर्दन पर एक जलने का निशान था।

उसने एक्टिवा को थोड़ा अंदर लिया और एक निपुण कारीगर जैसे अपना काम करने लगा।

साहब इस में ३ पंक्चर है, क्या करूँ? आपको पंक्चर ठीक करवाना  है कि  ट्यूब बदलवानी  है?”

पता नहीं क्यों पर मेरा ध्यान उसके वो ज़ख्म पर ही जा रहा था। तभी मेरा ध्यान तस्वीर पर पड़ा, शायद वो उसकी बेटी की तस्वीर थी।

साहेब ट्यूब बदल दूँ? ३५० की ओरिजिनल आएगी?”

मुझे उसके शब्द सुनाई दे रहे थे पर मैं  बिना कुछ बोले बस उसके घाँव को देख रहा था।

उसको फिर समझ आगया की में उसके देख रहा था!

उसने सीधा एक ही सवाल पूछा मुझसे, “ साहब आप धर्म या मज़हब में मानते हैं ?”

“नहीं, मेरा मज़हब तो सिर्फ मेरा काम है”

उसके होठ दो मिनट के लिए ऐसे थरथराये मानो उस एक मिनट में उसने मेरा चेहरा को पढ़कर मेरे सारे सवाल जान लिए हो।

“साहब, आप यह जानना चाहते हो ना की मुझे यह ज़ख्म कैसे आये ? बहुत कम ऐसे लोग मिलते है जो रूह की गहराई में दबी हुई बात समझ सकते है। आप जिस तरह मुझे देख रहे थे वह देखकर ऐसा लगा की आप उन थोड़े लोगो में से है जो दर्द महसूस कर सकते हो।

यह सुनकर बड़ी ही बैचैनी से मैंने पूछा की, “क्या तुम मुझे बताओगे की तुम्हारे साथ क्या हुआ?”

“आप चाय पियेंगे ? कहानी थोड़ी लंबी है। “

उसने मेरी एक्टिवा का काम बाजु में रखा, अपने घर की अलमारी से २ गिलास निकले और बढ़िया सी अद्रक वाली चाय की प्याली मुझे दी।  मैं उसके सामने ऐसे बैठ गया मानो एक ५ साल का बच्चा अपनी दादी से रात की कहानी सुनने बैठ रहा हो।

माचिस से अपनी बीड़ी जलाते हुए वह बोला, “साहब, यह  बात है  २००२ गुजरात दंगे के वक़्त की | मैं अहमदाबाद में  दंगे से  ६ महीने पहले  कपडे का व्यापार करने आया था। ६ महीने अहमदाबाद में रहकर लगा की इधर व्यापार में  अच्छा मुनाफ़ा है तो बीवी और ६ साल की बच्ची को भी बुला लिया। हमने दरियापुर की एक चॉल में छोटा सा २ कमरे का घर किराये पे लिया था।  लेकिन क्या पता था की उसके दो दिन के बाद ही गोधरा में ऐसी हिंसक घटना होने वाली थी। एक घटना और उसने पूरे गुजरात को हिला दिया। मैंने ६ महीने में अहमदाबाद का यह रूप पहली बार देखा था, अहमदाबाद तो जाने दो मैंने गुजरात का यह  रूप पहली बार देखा था। यहाँ लोग एक दूसरे को धर्म से नहीं काम से जानते थे, पर २७ फ़रवरी, २००२ के बाद यहाँ लोग एक दूसरे को केसरी कफ़न और सर पर टोपी से परखने लगे। अगर गलती से तुमने मज़हब बोला तो तुम मुसलमान और धर्म बोला तो हिन्दू। हमारे इलाके में दंगे करीब अगले दिन से शुरू हो गए, कुछ पता नहीं चल रहा था की कौन किसको मार रहा है और कौन किसका दोस्त है । जो लोग साथ क्रिकेट खेलते  वह आज एक दूसरे की जान से खेल  रहे थे  और जो साथ चाय पीते थे वह आज एक दूसरे खून के प्यासे थे /”

उसने अपनी बीड़ी का कश लेते हुआ कहा, “साहब आपके जैसे मेरा भी धर्म या मज़हब जो भी  आप कहे ,काम ही रहा है। मुझे एक बहुत  बड़ा आर्डर नागपुर भेजना था और वह भी ३ मार्च के पहले, मैं  दो दिन तो घर पर ही था  यह सोचकर की शायद सब ठीक हो जायेगा  थोड़े समय में  पर ऐसा कुछ नहीं  हुआ, सारी  जगह कर्फ्यू लगा हुआ था अब निकलू तो भी कैसे?

अगर गलती से तुम चले भी  गए और किसी गली से निकल रहे हो तो जो हिन्दू  हो  तो तुम्हारा जनोई देखेंगे, गायत्री मंत्र बुलवाएंगे और अगर न आया तो तुम्हारा फैसला तलवार से होगा ! मुसलमान की गली में भी उतना कोई फर्क नहीं  था। आदमी खून के प्यासे थे और सच बोलू तो अंधे  भी |

“२ मार्च हो गई पर परिस्थि कुछ ज़्यादा सुधरी नहीं, घर पर बहुत राशन  भी नहीं था। जब मेरी वाइफ और बच्ची सो रही थी मैं बहार निकला अपना माल दुकान से लेकर किसी भी तरह हाईवे तक पहुंचा नागपुर भेजवाने के लिए । जैसे ही बहार निकला तो देखा की रास्ते जहा चलने की जगह नहीं  थी वो रास्ते आज खली थे / कुछ लड़के रस्ते से एक बाजु से लोगो को  सब उठाकर जा रहे तो, तो दूसरी बाजु कुछ लोग बसों को लगाई हुई आग बुझा रहे थे। “

“पतली गलियों से निकलने का सवाल ही खड़ा नहीं था क्योंकि वह हमेशा खुद को मज़हब के रक्षक कहने वाले लोग तलवार लिया घूमते रहते थे। “

“ जैसे ही में अपनी दुकान के पास पहुँचा जो राटनपोड़ इलाके में थी मैंने  देखा की…

to be continued…


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Vyom Desai

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