गुजरात की वो कहानी, पंक्चर वाले की ज़ूबानी – 2

गुजरात की वो कहानी, पंक्चर वाले की ज़ूबानी – 2

गुजरात की वो कहानी, पंक्चर वाले की ज़ुबानी –   has been edited by Ishita Gupta


“जैसे ही में अपनी दुकान के पास पहुँचा जो राटनपोड़ इलाके में थी, में ने देखा की वो गलियों का नक्शा पूरा बदल गय था। जिस गलियों में हम धंधा करते थे वहां आज मज़हब का धंधा हो चूका था / जैसे ही में अपनी दुकान की और बढ़ा, में ने देखा मेरे पीछे कोई धार्मिक सेना का दल  था, उन लोगो मुझे पीछे से मेरी पिठ पर बड़े ही जोर से डंडा मारा, जिसकी वजह से मेरे पैर लड़खड़ाए और मेरा संतुलन बिगड़ गया / जैसे ही में गिरने जा रहा था, उस दाल में से एक बन्दे में मुझे पकड़ लिया। उसने अपना चेहरा कपडे से ढके हुआ था पर उसकी आँखें, वो आँखें में कभी नही भूल सकता; उसकी आँखों में अजीब सा ख़ुन्नस था और एक सेहमा सा डर।”

“उन लोगो में से आदमी शायद उनका सरदार था, वो आगे आया और उसने मुझसे पूछा,

“तुम मुसलमान हो ना?”

“नहीं, साहब!”

“तो चलो गायत्री मंत्र बोलो।”

“ साहब, में हिन्दू बी नहीं हूँ, और मुझे नमाज़ पढ़ना बी आता है और गायत्री मंत्र बोलना भी”, यह कहकर में उसकी आँखों में देखता रहा, उसकी सांस फूलने लगी, उसने एक हाथ से मेरे गले पर खंजर रखा और दूसरे हाथ से मेरे पेट में अपनी पूरी ताकत से मारा। मेरी ज़िन्दगी में पहली बार मुझे किसी ने मारा था, में उसके बाद भी उसकी आँखों में देख रहा था, मुझे ज़रा सा बी डर नही लगा बस इतना था की मुझे जल्द ही दुकान पहुंचना था।”

उसने लम्बी से सांस ली, चाय की एक चुस्की भरी और बोला, “मेरी आँखों में मौत का डर न देख कर, उसके सरदार ने कहा, “जिस आदमी को मौत से डर नहीं लगता उसको मार कर हमें कुछ नहीं मिलेगा।” और ऐसा कहकर उन लोगो ने मुझे छोड़ तो दिया और जैसे ही में आगे जाने के लिए अपने कदम बढ़ाये उन में से एक ने मुझे पीछे से पीठ पर कुछ लोहे का मारा और में उसके दूसरी मिनट ही ज़मीन पर गिर गया। जैसे ही गिरा मेरा सर सामने जलते हुए  स्कूटर के साइड स्टैंड से टकराया और तब ये  दाई आँख से सिर तक एक गेहरे घाँव ने मेरा चेहरे को हमेशा के लिए या निशान दे दिया।”

अपने वो घाँव को अपने हाथ से स्पर्श करते हुए बोला, “आज भी या घाँव अपने मालिक को ढूंढ रहा है। में खड़ा नहीं हो पा रहा था और सच बोलू तो डर लग रहा था। हिम्मत करके, लड़खड़ाते पांव के साथ खड़ा हुआ और दुकान की तरफ चलने लगा। जैसे ही मेरी दुकान के पास पंहुचा, मेरे कदम रुक गए, मेरा शरीर २ मिनट के लिए सुन्न पद गया और आँखों से आँशु की बाढ़ बहने लगी। वो चाली की सारी दुकानों को आग लगा दी थी। वो लड़खड़ाते पाँव के साथ में अपनी दुकान की ओर दौड़ा ये सोचते हुए थी शायद उसका कुछ अंश बाकि रह गया हो। अपने आप को संभालकर टूटे हुए दरवाज़े के पंहुचा और देखा तो कुछ नहीं बचा था। मेरे पुरे ६ साल की महेनत, ६ महीने की कमाई और ६० लाख के दस्तावेज़ चले गए। अब  करू तो बी क्या करू और क्यों करू ऐसा हो रहा था।”

 

जब उसने ये बात बोली, तब में उसका चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रहा था पर उसके चेहरे पर किसी उदासी की निशानी नही थी और न कोई अफ़सोस या गुस्सा।

मैंने उसको पूछा, “फिर आगे ?”

अपनी दूसरी बीड़ी जलाते हुआ वो बोला, “फिर में सोच रहा था थी अब क्या करू? थोड़ा बोहोत मार्किट से लिया था वो वापिस कैसे करूँगा और दिमाग में बस एक ही बात थी कीअब या शहर छोड़ कर चले जाना है। ऐसा सोचते सोचते में ने घर की तरफ प्रस्थान करना शुरू किआ। रास्ते में ना पुलिस ने रोका ना कोई धर्म या मजहब के रक्षक ने। अहमदाबाद अब ऐसा लग रहा था जैसे माँ के बिना की संतान।  ये शहर रो रहा था और ढूंढ़ रहा था अपनी माँ को। “

“रस्ते के एक बाजु किसी बस सङ्गति  हुई मिलती थी तो दूसरी बाजु लोगो के घर, एक सिपाही लाश उठा रहा था तो तीसरी बाजु लोग वो सिपाही को मरना  चाहते थे। जैसे ही घर के पास पहुंचा तो देखा की इधर सिपाही और दाल के बिच हाथ पाई हो गई है। में जल्दी से दौड़ता हुआ घर पंहुचा तो मेरी रूह कांप उठी। मैंने देखा की मेरी पूरी चॉल को दल ने मिलकर आग लगा दी और जो इंसान बहार आ रहा था, उनको वो लोग तलवार से मर दाल रहे थे।  मुझे नहीं पता चल रहा था की अंदर जाऊ तोह बी कैसे ?जैसे ही में आगे बढ़ा १ आदमी तलवार लेकर मेरे सामने आया पर वो मुझे मार नहीं पाया क्यों की वो आदमी की दुकान मेरी बाजु की दुकान थी और हम ६ महीनो में अच्छे दोस्त बन गए थे। “

“उसने मेरी मदद की मुझे मेरे घर तक पहुंचने में पर तब तक बोहोत देर हो चुकी थी तब तक. घर की ज़मीन पर मेरी पत्नी अर्ध मृत अवस्था में अपनी आखरी साँस ले रही थी। में उसकी तरफ दौड़ा और उसको बप्लव,” मुझे माफ़ कर दो में तुम्हे छोड़ कर दुकान के लिए चला गया।”

उसने सिर्फ इतना कहा, “अपनी बच्ची को में ने सही सलामत एक पारसी परिवार के साथ भेज दिए है क्यों की ये लोग उन्हें जाने दे रहे थे।” ऐसा कहकर उसने अपनी आखरी सांस ली। “

“में ने बोहोत कोशिश की अपनी बच्ची को ढूंढ़ने की पर शायद वो काफी नहीं थी। साहब, ३ मार्च २००२ को  आखरी बार रोया था। ये सब होने के कुछ वक़्त के लिए में ने राजस्थान एक मिल में काम किआ पर पता नहीं क्यों गुजरात  की याद सत्ता टी रही। इसीलिए २ साल बाद इधर वापिस आया और बस ये घर में गुज़ारा कर रहा हूँ। चित्रकार हूँ और दुनिया के लिए पंक्चर वाला। “

उसकी कहानी लम्बी थी पर वो कहानी में बता नहीं सकता क्यों की उस में आदमी का मजहब पता चल जाता है। उसने न मुझे अपना नाम  बताया और न मैंने उसको पूछा। बोहोत कुछ बोलना चाहता था  पर बोल ही नही पाया क्यों की उस आदमी के चेहरे पर अभी कोई भाव नहीं थे न कोई अफ़सोस। वो अपने आप में ही एक अंत था। उसने मेरे टायर की ट्यूब बदल दी और में उसको पैसे देकर चला गया।

आज भी उसके बारे में सोचता हूँ तो हृदय काँप उठता है। ये थी वो दंगे की कहानी एक पंक्चर वाले की ज़ुबानी।


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Vyom Desai

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