अनचाहा उत्तर

अनचाहा उत्तर

🌱“मेरे कुछ सवाल है, जो सिर्फ कयामत की रात पुछूंगा तुमसे|
क्योंकि उससे पहले तुम्हारी और मेरी बात हो, उस लायक नहीं हो तुम!”
– झाकिर खान🌱

तुमने प्यार करने का हक ताे छीन लिया हमसे, अब दर्द देने का तो मत छीनो|
तुमने जीने का हक तो छीन लिया हमसे, अब मरने का तो मत छीनो||

माना की नये रंग मिलने पर, तुम्हें पुराने की परवाह नहीं|
हम तो अब भी तुमसे एक तरफा प्यार कर सकते हैं, पर ना, अब नहीं||

तुम देखकर भी अनदेखा करके चली जाना, उसका कोई गम नहीं|
क्योंकि अब हमारे राग का तुम तराना नहीं, तो उस गम का प्रश्न ही नहीं||

तुम आज भी उन बालियों में उतनी ही सुंदर लग रही होगी|
पर अब उस हसीन आँखों की गुस्ताख़ियों का झिकर नहीं||

तुम चाहे कितनी बड़ी बन जाओ, अब तुमसे बात करने का कोई इरादा नहीं|
कभी ज़रूरत पड़े, तो थोड़ा झुककर पूछना भला, हाँ, पर तुमसे अब कोई वादा नहीं||

अब तुम ही तराशो और बताओ की गलती थी या नहीं|
क्योंकि हममें तो परख थोड़ी कम है,
सच और स्वाभिमान की समझ हमें है नहीं,
बस कोई उत्तर की अपेक्षा अब नहीं||

अंधकार, प्रकाश, अंधकार |||
– निहित परीख

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